Director’s Note

वीणा वेणु आर्ट फाउंडेशन मेरे लिए क्या हैं ?

स्वप्न हैं वीणा वेणु आर्ट फाउंडेशन . स्वप्न हैं कहने से अच्छा कहूं की यह मेरे द्वारा निर्माण किया एक स्वप्न जगत हैं। बचपन में नंदन वन की कहानी सुनी थी जहाँ हर प्राणी आनंद और सुख से बिना किसी घृणा ,भय ,
विद्वेष ,कटुता ,लोभ और दुःख के जीता था। जहाँ सब और शांति थी ,हर किसी पर भरोसा किया जा सकता था ,हर किसी को अपना माना जा सकता था , हर कोई एक दूसरे के आनंद में आनंदित रहता था ,जहाँ हर कोई सुखी था। एक ऐसा ही नंदन वन मैं बनाना चाहती थी , या कहूं बनाना चाहती हूँ ,एक ऐसा वन जहाँ संगीत के स्वरों की शांति हो ,जहाँ छोटा-बड़ा ,ग़रीब -अमीर हर विद्यार्थी समान महत्व प्राप्त करे ,जहाँ आकर इस हर दिन जलते -जलाते संसार और सांसारिक मायाग्नि से कुछ क्षण की शांति सबको मिल सके। जहाँ हँसी हो ,ख़ुशी हो ,कुछ करने – कुछ पाने की इच्छा हो ,कुछ कर दिखाने की चाह हो ,कुछ कर गुजरने के लिए जी तोड़ कोशिश हो। प्रतियोगिता हो पर भाव प्रतियोगी का न होकर स्वयं में सुधार लाने का हो। स्वयं को और परिष्कृत कर जाने का हो। यह मेरा स्वप्न जगत हैं ,जहाँ आने वाला हर व्यक्ति, हर विद्यार्थी मेरा अपना सगा हैं ,मेरा अपना परिवार। उस परिवार की सरदार मैं भले ही हूँ पर मेरी हर श्वास मेरे विद्यार्थियों के चेहरे पर दिखने वाली मुस्कान ,उनकी प्रगति ,उनकी उन्नति की मोहताज हैं। इस वीणा वेणु नाम के स्वप्न जगत में मैं एक मुखियां के हैसियत से कई – कई बार कई सारे निर्णय लेती हूँ ,लुंगी। जिनका एक मात्र उद्देश्य इस जगत का – इस आनंद वन का ,इस स्वप्न का विस्तार करना और इस स्वप्न जगत में शामिल होने की चाह रखने वाले ,इस स्वप्न जगत के हर सदस्य की उन्नति का ख्याल रखना हैं और होगा। एक शेरनी की आँखे उन सभी संकटों – धोखों -मुसीबतों को बहुत दूर से देख लेती हैं जिनका अनुमान भी उसके शावकों को नहीं होता ,वो उस कल के लिए उनको प्रशिक्षण देती हैं ,जिस कल के आने का कोई भान तक उसके शावकों को नहीं होता।
सारे माता – पिता जानते हैं कि बचपन में बच्चे खुद को बच्चा कहलाना पसंद नहीं करते ,उन्हें लगता हैं की २-४ साल की छोटी अवस्था में ही उन्हें सब ज्ञात हैं ,पर हर माँ -पिता जानते हैं की सत्य क्या हैं। मेरे फाउंडेशन में आने वाले सभी विद्यार्थी संगीत की दृष्टि से उन छोटे से -नन्हे से बालको से हैं जिन्हे अभी बहुत कुछ समझना -सीखना बाकी हैं। हां कभी -कभी वो खुदको बहुत बड़ा -समझदार मानते हैं पर हैं तो बालक ही ! और मेरा मन – मेरा मस्तिष्क ,मेरी आत्मा मेरे इन सभी सांगीतिक बालकों में खोयी रहती हैं ,एक माँ की तरह उन्ही की चिंता में निमग्न। आपके स्वप्न और स्वप्न जगत में आपके द्वारा रचे हर चरित्र से आपका वैसा ही रिश्ता होता हैं जैसा एक माँ का अपने बच्चे से ! क्योकि वहां सब कुछ आपका अपना क्रिएशन हैं ,आपकी अपनी रचना।
ये जो जगत हैं ,जिसमें हम और आप जीते हैं ,जन्मते हैं ,मरते हैं यह उस ईश्वर की रचना हैं और इस ईश्वर की रचना में हम सभी उस ईश्वर का कुछ न कुछ काम करने के लिए आते हैं। अगर कोई मुझसे पूछे मैं एक इंसान के रूप में क्या करती हूँ ? मैं ईश्वर के बच्चे के रूप में क्या कर रही हूँ ? मैं उस सर्वेसर्वा ईश्वर के लिए क्या कर सकती हूँ या क्या कर रही हूँ ? तो मेरा उत्तर होगा मैं एक आनंद जगत का निर्माण और संवहन कर रही हूँ ,जहाँ मैं संगीत कला को हर रोम -रोम में स्थापित कर रही हूँ ,मैं वीणा की आवाज से ,तानों की तरंग से ,सितार की झंकार से , गायन की पुकार से ईश्वर के रचे संसार को एक ईश्वर रूपी नाद प्रदान कर रही हूँ। मैं हर उस मन को छोटी सी – भोली सी ख़ुशी और प्यारी सी आशा दे रही हूँ जो मेरे यहाँ संगीत सिखने आती हैं और एक स्वर लग जाने से -एक आलाप हो जाने से -एक राग गाये जाने से खुश हो जाती हैं। मैं कोई टाटा – बिरला या अम्बानी नहीं हूँ ,नहीं मैं कोई मंत्री -संत्री या बड़ी विशिष्ट व्यक्ति हूँ जो बहुत बड़ा अंतर लोगो के जीवन में ले आये ,मैं तो एक सर्व साधारण स्त्री हूँ ,जिसका सुख -दुःख , जीवन -मरण ,कष्ट -प्राप्ति सब का सब इस वीणा -वेणु नाम के नंदन वन में और यहाँ आने वाले हर विद्यार्थी के आनंद से ,उसकी तरक्की से बंधा हुआ हैं। मैं एक ऐसा विचित्र जीव हूँ जो स्वयं के लिए नहीं ,अपने स्वप्न सखाओं के लिए जीता हैं वो हैं उसके विद्यार्थी ,वो हैं संगीत सिखने -समझने की चेष्टा रखने वाले सभी प्राणी। मैं एक ऐसा जीव हूँ जिसकी एकमात्र ही आस्था हैं कि उसके देश के संगीत को, कलाओं को ,ज्ञान को ,उसके देश के सब लोग जाने -माने और पहचाने। मैं वो विचित्र जीव हूँ जो यह चाहता हैं की जब मैं अंतिम श्वास लूँ उस समय भारत का हर एक व्यक्ति वीणा बजाना जानता हो ,अपने संस्कृति -कला की क़ीमत पहचानता हो। उनके सबके जीवन में स्वरों का आनंद हो ,गीतों की लड़ियाँ हो ,जीवन बहुत सरल हो और सर्वत्र शांति हों। आप बताएं इन सबमे मैं कहाँ हूँ ? मेरा अस्तित्व ,मेरा व्यक्तित्व ,मेरी श्रद्धा ,मेरा प्रेम सब कुछ तो इस वीणा वेणु नाम के नंदन वन और मेरी भारतीय संगीत -संस्कृति -कला में ही समाया हुआ हैं ,वहीँ तक सिमित हैं। सोचती हूँ तो हतप्रभ रह जाती हूँ कि मेरी श्वासें, मेरी जिंदगी ,इसे मैंने कभी अपना माना ही नहीं ,मैं क्या हूँ ,मेरी अपनी क्या इच्छाएं हैं ,मुझे क्या पसंद -नापसंद हैं यह सब तो मैं कबका भुला चुकी हूँ ,सिर्फ और सिर्फ मेरे अपने लोगो के लिए ,उन लोगो के लिए जो इस नंदन वन के सदस्य हैं या आज न कल इस नंदन वन के सदस्य होंगे।
पैसा तो सब्जी – भाजी बेच के भी कमाया जा सकता हैं और कोई भी काम बड़ा -छोटा नहीं होता ,तो मैं क्या कर रही हूँ एक बुनकार की तरह तमाम कठिन तकनीकों से एक ऐसा उबदार दुशाला बन रही हूँ ,जिसकी ऊब मैं मुझे तो शायद कभी एक क्षण न रहने को मिले ,पर मेरे सारे शावक उस दुशाला को ओढ़े जीवन की सारी अशांति -कठिनाई और दुःख से क्षण में मुक्ति पा ले। जरा सोचिये यह नंदन वन किसी मोल – भाव किसी नाप -तौल का स्थल हैं ? आप मंदिर में जाकर क्या करते हैं ? ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करते हैं ? उससे आशीर्वाद लेते हैं ? या उस मूर्ति में लगे पत्थर और उस पर चढ़े गहनों की क़ीमत गिनते रहते हैं ? एक भवन का निर्माण भी करना हो तो कितने पत्थर लगाने पड़ते हैं ,कितनी रेत माटी डालनी पड़ती हैं ! फिर ये तो आपका अपना वन हैं ,जहाँ आपके भविष्य का निर्माण होता हैं ,यहाँ तो आपको गढ़ा जाता हैं ,आपको तराशा जाता हैं ,आपको तैयार किया जाता हैं ,क्या ये बिना किसी त्याग के संभव हैं ? और अगर कुछ कष्ट करके ,क्षणिक सुख खोके आप जीवन भर का ज्ञान पा रहे हैं तो सोचिये आप क्या पा रहे हैं !
मैं सिर्फ आपके लिए काम कर रही हूँ ,सिर्फ अपने विद्यार्थियों के सुख में सुखी हूँ।
वीणा -वेणु आर्ट फाउंडेशन कोई संस्था नहीं एक स्वप्न जगत हैं ,एक नंदन वन हैं जो मैंने अपने लिए नहीं आपके लिए और उन सबके लिए निर्माण किया हैं या कर रही हूँ जिनसे मेरा कोई नाता नहीं -जिन्हे मैं अभी जानती तक नहीं -जिनसे मुझे कुछ मिलने वाला नहीं !
आप खुद सोचिये एक गुरु क्या मांगता हैं और क्या देता हैं।
मेरे सभी विद्यार्थियों को टीचर्स डे की एक छोटी सी भेट

Dr. Radhika Veena Sadhika

First Lady Vichitra Veena Player

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